श्री यंत्रराज

श्री विद्या कल्याण धाम में विराजित मेरु श्री यंत्र – श्री यंत्रराज – की प्राणप्रतिष्ठा, शृंगार दर्शन, नवावरण और ह्रीं बीजमंत्र का परिचय।

मेरु श्री यंत्र

श्री यंत्र श्री विद्या परंपरा में आद्यशक्ति श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी का यंत्रस्वरूप है। समतल रेखांकन के स्थान पर त्रिआयामी, ऊँचाई वाले रूप में निर्मित श्री यंत्र को मेरु कहते हैं। श्री विद्या कल्याण धाम में काले पत्थर से निर्मित भव्य मेरु श्री यंत्र विराजमान हैं, जिन्हें भक्त श्री यंत्रराज कहकर पूजते हैं।

प्राणप्रतिष्ठा

२ से ४ मई २०२५ (शुक्रवार से रविवार) के बीच बाला, कामाख्या, दस महाविद्या, दिग्गज और अष्ट महानाग युक्त दिव्य श्री यंत्र प्राणप्रतिष्ठा यज्ञ महोत्सव सम्पन्न हुआ। भव्य संतवाणी-लोकडायरा और दिव्य रास-गरबा के साथ तीन दिनों का यह महोत्सव धाम के इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है।

शृंगार दर्शन

प्रत्येक शुक्रवार संध्या श्री यंत्रराज का पुष्पों, हारों और दीपमाला से शृंगार होता है। शृंगार दर्शन और आरती का लाभ सभी भक्तों के लिए खुला है। पौष पूर्णिमा (शाकंभरी पूर्णिमा), गुरुपूर्णिमा और पाटोत्सव जैसे पर्वों पर श्री यंत्रराज की महापूजा तथा लक्षार्चन होता है।

नवावरण – बाहर से भीतर

श्री यंत्र में नौ आवरण हैं। बाहरी चौकोर भूपुर – चार द्वारों वाला पृथ्वी का नगर – से आरंभ कर षोडशदल और अष्टदल कमल, फिर एक-दूसरे में गुँथे नौ त्रिकोण (चार ऊर्ध्वमुख शिव-त्रिकोण और पाँच अधोमुख शक्ति-त्रिकोण) और अंत में केंद्रस्थ बिंदु – यह क्रम स्थूल से सूक्ष्म की ओर, बाहर से भीतर की ओर साधना-यात्रा दर्शाता है। इस वेबसाइट की रचना में भी बिंदु, त्रिकोण, कमल और भूपुर के यही प्रतीक प्रयुक्त हुए हैं।

ह्रीं – बीजमंत्र

ह्रीं श्री विद्या में भुवनेश्वरी का बीजमंत्र है; इसे हृल्लेखा और तारक बीज भी कहते हैं। पारंपरिक व्याख्या के अनुसार इसमें “ह” शिव का, “र” प्रकृति (अग्नि) का, “ई” महामाया का और अनुस्वार-बिंदु दुःखहर्ता जगन्माता का सूचक है। धाम के प्रचार-पत्रों और इस वेबसाइट पर दिखने वाला ह्रीं इसी बीज का स्मरण है।